Acharya Shri 108 Mahaveer Kirti Ji Maharaj

Profile

Name Acharya Shri 108 Mahaveer Kirti Ji Maharaj
Gender Male
Date of Birth 03/May/1910
Name before Diksha Mahendra Kumar
Father's Name Shri Ratan Lal Ji Jain
Mother's Name Smt. Bunda Devi
Place of Birth Firozabad (Uttar Pradesh)
Kshullak Diksha (Date, place and name of guru)
01-Jan-1995 / Tankatunka (Gujarat) / Acharya Shri 108 Veer Sagar Ji Maharaj
Muni Diksha (Date, place and name of guru)
17-Mar-1943 / Udgaon, District-Kolhapur (Maharashtra) / Acharya Shri 108 Adisagar Ji Maharaj (Ankalikar)
Acharya Diksha (Date, place and name of guru)
01-Jan-1943 / / Acharya Shri 108 Adisagar Ji Maharaj (Ankalikar)
Samadhi (Date, place)
06-Jan-1972 / Mehsana (Gujarat)

Gallery

Other Details

About Acharya Shri 108 Mahaveer Kirti Ji Maharaj

 

आपने १६ वर्ष में श्रावक धर्म का निर्दोष आचरण करना प्रारंभ कर दिया और कठोर व्रतों का पालन करने लगे।संसार को असार समझकर शरीर व् भोग से विमुख हो गये और परम पूज्य मुनि चन्द्र सागर जी से सप्तम प्रतिमा के व्रत ग्रहण किये और २५ वर्ष के उम्र में मुनि दीक्षा वीर सागर जी से ग्रहण कीऔर अपना सारा समय ज्ञान उपार्जन व साधना में लगाने लगे।अब आपको ऐसे गुरु की तलाश थी जो त्याग और तपस्या साधना में लीन होकर ख्याति लाभ ,पुजादि से दूर हो।आखिर वो समय भी आ गया और आप उदगांव दक्षिण में विराजमान आचार्य आदिसागर जी अंकलीकर से मुनि दीक्षा हेतु निवेदन किया। आचार्य श्री ने खा की में निस्प्रही हूँ।जंगल में रहता हूँ आप उत्तर भारतीय है।आखिर आपने आचार्य श्री से निवेदन करके मुनि दीक्षा ले ली । आचार्य श्री की सेवा करना और अपने को ध्यान ताप व साधना में लगाना आपका मुख्य कार्य था।आचार्य श्री आदिसागर जी ने महावीर कीर्ति जी को सुयोग्य शिष्य मानकर १९४३ में उदगांव में अपना आचार्य पद से महावीर कीर्ति जो अलंकृत किया और आप मुनि महावीर कीर्ति से से आचार्य महावीर कीर्ति जी बन गए ।आपने अपने गुरु की सल्लेखना पूर्वक समाधी करायी । उसके बाद आपने अपने संघ के साथ दक्षिण में विहार कर धर्म प्रभावना करने लगे।आपने दक्षिण महाराष्ट्र ,बिहार ,उड़ीसा ,बंगाल ,गुजरात ,राजस्थान ,मध्य प्रदेश आदि स्थानों पर विहार करके धर्म की प्रभावना करी और भव्य जीवों को मुनि ,आर्यिका ,ऐलक, क्षुल्लक दीक्षा दी।और अंत समय में अपना आचार्य पद श्री विमल सागरजी को देकर सल्लेखना पूर्वक समाधिमरण किया।


More Details

Latest News